जहानाबाद : पति की मौत के बाद जब एक औरत का सुहाग उजड़ता है तो अक्सर समाज उसे सिर्फ विधवा के एक शब्द में समेट देता है पर इस शब्द के पीछे छुपी होती है पूरी दुनिया, जो जिम्मेदारी कल तक दो लोगों की थी आज वह अकेले उठाने पर मजबूर हो जाती है हालांकि एक विधवा का चूल्हा जलना सिर्फ पेट भरने की कहानी नहीं बल्कि वह हर उस औरत की जीत है जो हालात के आगे घुटने नहीं टेकती तथा समाज को बताती है कि सिंदूर मिट सकता है पर स्वाभिमान नहीं उसकी रसोई से उठता घुंआ समाज की रूढियों की आंखों में जलन पैदा करता है और आने वाली पीढ़ी को रास्ता दिखाता है, स्कूल की फीस से लेकर राशन तक हर फैसला उसे अब अकेले लेना पड़ता है ऐसा ही एक मामला देवमई ब्लॉक की ग्राम पंचायत मिर्जापुर मकरंदपुर का है जहां की निवासिनी शबीना परवीन ने बताया कि पति दिलशाद का देहांत 7 वर्ष पूर्व हो गया था, सबसे बड़े पुत्र उजैफ़, अरहान सहित पुत्री अर्शिया सभी बच्चे छोटे-छोटे थे पति की मौत के बाद मेरे जीवन में अंधेरा छा गया लेकिन बच्चों की परवरिश कैसे होगी यह सोचकर मैंने गांव में ही सिलाई करने के साथ-साथ सिर्फ अपना चूल्हा ही नहीं जलाया बल्कि दूसरों को भी सिलाई सिखाई एवं रोजगार दिया बकरी एवं मुर्गी पालना शुरू किया हालातो से लड़कर आज सभी बच्चों को पढ़ रही हूं सरकार द्वारा मुझे बच्चे पढ़ाने से लेकर चूल्हा जलाने तक मदद भी की जा रही है जो हर माह राशन के रूप में दिया जाता है विधवा महिला के लिए सिर्फ खाना पकाना और बच्चे पालना नहीं बल्कि हिम्मत का ऐलान है















