नई दिल्ली। तेजी से मजबूत हो रहा एल-नीनो (El Niño) इस बार आधुनिक इतिहास की सबसे शक्तिशाली जलवायु घटनाओं में शामिल हो सकता है। जलवायु वैज्ञानिकों के ताजा विश्लेषण और मौसमी मॉडल संकेत दे रहे हैं कि 2026 के अंत तक यह और अधिक ताकतवर होगा, जिससे दुनिया के कई हिस्सों में बाढ़, भीषण हीटवेव, सूखा और तूफानों जैसी चरम मौसमीय घटनाएं बढ़ सकती हैं।
अमेरिकी एजेंसी NOAA ने पुष्टि की है कि एल-नीनो की परिस्थितियां विकसित हो चुकी हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, यह घटना उत्तरी गोलार्ध की सर्दियों के दौरान अपने चरम पर पहुंच सकती है।
पिछले सभी रिकॉर्ड टूटने की आशंका
जलवायु वैज्ञानिक जेक हॉसफादर के विश्लेषण के अनुसार, 14 मौसमी जलवायु मॉडलों के 667 पूर्वानुमानों से संकेत मिलता है कि इस बार नीनो 3.4 एनोमली करीब 3.6 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकती है। इससे पहले 2015-16 के सुपर एल-नीनो के दौरान यह आंकड़ा 2.75 डिग्री सेल्सियस था। अधिकांश मॉडल मान रहे हैं कि यह अब तक का सबसे शक्तिशाली एल-नीनो साबित हो सकता है।
भारत पर क्या होगा असर?
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने पहले ही दक्षिण-पश्चिम मानसून को लॉन्ग पीरियड एवरेज (LPA) का लगभग 90 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया है। इंडियन ओशन डाइपोल (IOD) के तटस्थ रहने की संभावना के कारण एल-नीनो के प्रभाव को संतुलित करने वाला कोई मजबूत प्राकृतिक कारक फिलहाल नहीं दिख रहा।
जून में देशभर में सामान्य से करीब 40 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई, जबकि जुलाई में भी वर्षा सामान्य से काफी कम बनी हुई है। कमजोर मानसून का असर खेती पर साफ दिखाई देने लगा है।
खेती पर बढ़ी चिंता
केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के अनुसार, 10 जुलाई 2026 तक खरीफ फसलों की बुवाई 531.25 लाख हेक्टेयर में हुई, जबकि सामान्य रकबा 549.36 लाख हेक्टेयर है। सबसे अधिक चिंता धान की खेती को लेकर है, जहां बुवाई का रकबा सामान्य से काफी कम दर्ज किया गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आने वाले महीनों में मानसून में सुधार नहीं हुआ, तो कृषि उत्पादन, जल संसाधनों और खाद्य सुरक्षा पर व्यापक असर पड़ सकता है।











