संवाददाता: सैयद समीर हुसैन
मुंब्रा में 21 रमज़ान के मौके पर हज़रत मौला अली अलैहिस्सलाम की शहादत की याद में शिया समुदाय द्वारा ग़मगीन माहौल में विभिन्न धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। यह दिन पूरी कायनात के लिए गहरे दुख और ग़म का दिन माना जाता है। इस्लामिक परंपरा के अनुसार हज़रत अली अलैहिस्सलाम को रसूल अल्लाह हज़रत मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने विशेष दर्जा देते हुए फरमाया था कि “अली कुरान के साथ हैं और कुरान अली के साथ है, हक अली के साथ है और अली हक के साथ हैं।” इसी तरह ग़दीर के मैदान में एक लाख से अधिक हाजियों सहाबियों के सामने रसूल अल्लाह ने हज़रत अली का हाथ बुलंद करते हुए फरमाया था, “जिसका मैं मौला हूं, उसका अली मौला है।” इतिहास के अनुसार 19 रमज़ान को मस्जिद-ए-कूफ़ा में फज्र की नमाज़ के दौरान जब हज़रत अली सजदे की हालत में थे, तभी अब्दुर्रहमान इब्ने मुल्जिम ने ज़हर में डूबी तलवार से उनके सिर पर वार किया था। इस हमले में वे गंभीर रूप से घायल हो गए और 21 रमज़ान को उनकी शहादत हो गई।
इसी शहादत की याद में मुंब्रा के विभिन्न इलाकों में मजलिस और मातम का सिलसिला जारी रहा। मित्तल ग्राउंड स्थित वादिये हसनैन कब्रिस्तान में 21वीं शबे कद्र के मौके पर मौलाना सैयद शबाब हैदर साहब क़िब्ला ने अमाल करवाए। इसके बाद आयोजित मजलिस में हज़रत अली की शहादत की दर्दनाक घटना बयान की गई, जिसे सुनकर मौजूद अज़ादारों की आंखें नम हो गईं। हर साल की तरह इस साल भी शादी महल हॉल के पास से हज़रत अली का ताबूत और अलम बरामद किया गया। इसके बाद हज़ारों अज़ादारों की मौजूदगी में जुलूस निकाला गया, जो अमृत नगर दरगाह गेट से होते हुए अंबेडकर नगर स्थित मदरसे हसन मस्जिद तक पहुंचा। इस दौरान तमाम शिया समुदाय के लोगों ने ज़माने के आख़िरी इमाम, इमाम मेहदी अलैहिस्सलाम की बारगाह में पुरसा पेश किया और हज़रत अली की शहादत को याद कर उन्हें खिराज-ए-अक़ीदत पेश किया।









