नई दिल्ली। आने वाले दिनों में हवाई यात्रा का बजट कितना होगा, यह काफी हद तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में विमानन ईंधन की कीमतों पर निर्भर कर सकता है। देश की सबसे बड़ी एयरलाइन इंडिगो ने फिलहाल ईंधन की कीमतों को पहले से सुरक्षित करने यानी हेजिंग की योजना से दूरी बनाए रखी है। हालांकि, कंपनी भविष्य में अपनी इस नीति की समीक्षा करने की तैयारी कर रही है। इंडिगो के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) विली वॉल्श ने सोमवार को स्पष्ट किया कि एयरलाइन फिलहाल फ्यूल हेजिंग नहीं कर रही है और व्यापक समीक्षा पूरी होने तक इसे अपनाने की योजना भी नहीं है। ईंधन की लगातार बढ़ती कीमतों के बीच कंपनी का यह फैसला विमानन क्षेत्र के साथ-साथ हवाई यात्रियों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। दरअसल, विमानन कंपनियों के कुल परिचालन खर्च में विमान ईंधन यानी एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) की बड़ी हिस्सेदारी होती है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और रिफाइंड ईंधन की कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर एयरलाइंस के खर्च पर पड़ता है। जब ईंधन महंगा होता है तो कंपनियों की परिचालन लागत बढ़ जाती है। इस अतिरिक्त खर्च की भरपाई के लिए एयरलाइंस को टिकटों के किराये में बदलाव करना पड़ सकता है। ऐसे में इंडिगो की मौजूदा रणनीति पर यात्रियों की नजर बनी हुई है।
फिलहाल हेजिंग से दूरी
इंडिगो के सीईओ विली वॉल्श ने सोमवार को मीडिया से बातचीत में कहा कि कंपनी फिलहाल ईंधन की कीमतों को हेज नहीं कर रही है। उन्होंने बताया कि इस विषय पर कंपनी के बोर्ड के साथ चर्चा हुई है और भविष्य की जरूरतों को देखते हुए व्यापक समीक्षा की जाएगी। हेजिंग एक ऐसी वित्तीय व्यवस्था है, जिसके तहत एयरलाइन भविष्य में इस्तेमाल होने वाले ईंधन की कीमतों को पहले से सुरक्षित करने का प्रयास करती है। इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय बाजार में अचानक कीमतें बढ़ने की स्थिति में कंपनी को बड़े आर्थिक नुकसान से बचाना होता है। वॉल्श के मुताबिक, हेजिंग का उद्देश्य ईंधन की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव से जोखिम को नियंत्रित करना है, न कि बाजार में कीमतों के बढ़ने या घटने पर दांव लगाना। उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय घरेलू विमानन बाजार में फिलहाल प्रतिस्पर्धी एयरलाइंस भी ईंधन की हेजिंग नहीं कर रही हैं। ऐसे में इंडिगो के लिए अकेले इस व्यवस्था को अपनाना एक अलग तरह का जोखिम पैदा कर सकता है।कंपनी का मानना है कि जब घरेलू बाजार में दूसरी एयरलाइंस बिना हेजिंग के काम कर रही हैं, तब केवल एक कंपनी के लिए इस व्यवस्था को अपनाने से प्रतिस्पर्धा की स्थिति प्रभावित हो सकती है। इसी वजह से इंडिगो फिलहाल अपनी पुरानी नीति पर कायम है।
परिचालन खर्च का 40 फीसदी हिस्सा ईंधन पर
विमानन कंपनियों के लिए ईंधन सबसे बड़े खर्चों में से एक है। इंडिगो के कुल परिचालन खर्च में विमान ईंधन की हिस्सेदारी लगभग 40 प्रतिशत बताई गई है। इसका मतलब है कि ईंधन की कीमतों में मामूली बढ़ोतरी भी एयरलाइन के कुल खर्च को काफी प्रभावित कर सकती है। अंतरराष्ट्रीय विमानन बाजार की तुलना में भारतीय एयरलाइंस पर ईंधन का खर्च अधिक दबाव डालता है। इंडिगो प्रबंधन के मुताबिक, वैश्विक विमानन उद्योग में ईंधन की औसत हिस्सेदारी लगभग 32 प्रतिशत है, जबकि भारतीय कंपनियों के लिए यह करीब 40 प्रतिशत तक पहुंच जाती है। इस अंतर के कारण भारतीय एयरलाइंस अंतरराष्ट्रीय बाजार में ईंधन की कीमतों में होने वाले बदलावों के प्रति अधिक संवेदनशील रहती हैं। इसके अलावा रुपये की विनिमय दर में कमजोरी भी कंपनियों की लागत बढ़ा सकती है, क्योंकि विमानन क्षेत्र में ईंधन सहित कई महत्वपूर्ण खर्च अंतरराष्ट्रीय मुद्रा में जुड़े होते हैं।
सितंबर तिमाही में कंपनी को बड़ा नुकसान
बढ़ती ईंधन कीमतों और रुपये में कमजोरी का असर इंडिगो के वित्तीय प्रदर्शन पर भी पड़ा है। वित्त वर्ष 2026-27 की सितंबर तिमाही में कंपनी ने 1,879.1 करोड़ रुपये का शुद्ध घाटा दर्ज किया। इस दौरान ईंधन खर्च में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई। रिपोर्ट के मुताबिक, कंपनी का ईंधन खर्च सालाना आधार पर 67.2 प्रतिशत बढ़कर 9,967 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। बढ़ती परिचालन लागत ने कंपनी की लाभप्रदता पर दबाव बनाया है। इस स्थिति में इंडिगो के सामने एक तरफ परिचालन खर्च को नियंत्रित रखने की चुनौती है, तो दूसरी तरफ यात्रियों को प्रतिस्पर्धी किराये पर हवाई यात्रा उपलब्ध कराने का दबाव भी है। एयरलाइन को यह भी ध्यान रखना होगा कि टिकटों के दाम में बहुत अधिक बढ़ोतरी होने से यात्रियों की मांग प्रभावित हो सकती है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्यों महंगा हुआ विमान ईंधन?
विमानन ईंधन की कीमतों में तेजी के पीछे पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक रिफाइनिंग क्षमता में आई बाधाओं को प्रमुख कारण बताया जा रहा है। इन परिस्थितियों के कारण कच्चे तेल से विमानन ईंधन तैयार करने की लागत और रिफाइनिंग मार्जिन में बढ़ोतरी हुई है। इंडिगो के सीईओ वॉल्श ने बताया कि विमानन ईंधन की कीमतों पर क्रूड ऑयल के साथ-साथ क्रैक स्प्रेड का भी प्रभाव पड़ता है। क्रैक स्प्रेड से आशय कच्चे तेल की कीमत और उससे तैयार होने वाले रिफाइंड उत्पाद की कीमत के बीच के अंतर से है। उनके मुताबिक, वर्ष 2000 से 2025 के बीच विमानन ईंधन का ऐतिहासिक औसत क्रैक स्प्रेड लगभग 22 प्रतिशत रहा है, जबकि मौजूदा परिस्थितियों में यह बढ़कर करीब 65 प्रतिशत तक पहुंच गया है। इसका अर्थ है कि कच्चे तेल की कीमतों में उतनी बड़ी तेजी नहीं होने के बावजूद विमानन ईंधन महंगा बना हुआ है। वैश्विक स्तर पर रिफाइनिंग क्षमता प्रभावित होने से विमानन ईंधन की उपलब्धता पर भी दबाव पड़ा है। पश्चिम एशिया और यूरोप में पैदा हुई परिस्थितियों का असर अंतरराष्ट्रीय विमानन बाजार पर देखने को मिल रहा है। वॉल्श को उम्मीद है कि समय के साथ रिफाइनिंग क्षमता में सुधार होने पर यह स्थिति सामान्य हो सकती है। हालांकि, निकट भविष्य में ईंधन की कीमतें ऊंची बनी रहने की आशंका है।
2028 से लंबी दूरी की उड़ानों पर नजर
इंडिगो भविष्य में अपनी अंतरराष्ट्रीय उड़ानों का विस्तार करने की तैयारी भी कर रही है। कंपनी की योजना लंबी दूरी के अंतरराष्ट्रीय मार्गों पर अपनी मौजूदगी बढ़ाने की है। इसके लिए एयरलाइन अपने बेड़े में वाइड बॉडी एयरबस A350 विमान शामिल करने जा रही है।कंपनी को पहला A350 विमान वर्ष 2028 की दूसरी तिमाही से मिलने की उम्मीद है। इन विमानों में बिजनेस क्लास, प्रीमियम इकोनॉमी और इकोनॉमी क्लास की व्यवस्था होगी। शुरुआती 10 विमानों में बिजनेस क्लास के 16 फ्लैटबेड भी शामिल किए जाएंगे। यही विस्तार इंडिगो की हेजिंग नीति पर दोबारा विचार करने की एक बड़ी वजह बन रहा है। अंतरराष्ट्रीय लंबी दूरी के मार्गों पर प्रतिस्पर्धा करने वाली कई विदेशी एयरलाइंस पहले से ही अपने ईंधन खर्च का एक हिस्सा हेज करती हैं। ऐसे में इंडिगो भी भविष्य की जरूरतों के मुताबिक इस व्यवस्था का मूल्यांकन कर रही है। वॉल्श के अनुसार, लंबी दूरी की उड़ानों का विस्तार कंपनी को अपनी मौजूदा ईंधन प्रबंधन नीति की समीक्षा करने का अवसर देता है। इस मुद्दे पर बोर्ड के साथ शुरुआती चर्चा हो चुकी है और विस्तृत समीक्षा के बाद आगे फैसला लिया जाएगा।
सरकार के साथ भी चल रही बातचीत
ईंधन की बढ़ती कीमतों से राहत पाने के लिए इंडिगो सरकार के साथ भी बातचीत कर रही है। वॉल्श ने कहा कि कंपनी विमानन ईंधन की कीमतों में उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के लिए संभावित उपायों पर सरकार के साथ रचनात्मक चर्चा कर रही है। सरकार की ओर से पहले विमानन ईंधन की कीमतों को स्थिर रखने के उद्देश्य से प्राइस स्टेबिलाइजेशन फंड योजना लाई गई थी। इसके तहत एयरलाइंस को निर्धारित कीमत पर ईंधन उपलब्ध कराने की व्यवस्था प्रस्तावित थी। हालांकि, शुरुआत में किसी भी भारतीय एयरलाइन ने इस योजना में भाग नहीं लिया था और बाद में यह योजना आगे नहीं बढ़ सकी। वॉल्श ने कहा कि यदि सरकार भविष्य में कोई ऐसी व्यवस्था लाती है, जो कंपनी के लिए आर्थिक रूप से उचित होगी, तो इंडिगो उसमें भाग लेने पर विचार कर सकती है।
क्या महंगे होंगे हवाई टिकट?
ईंधन की बढ़ती कीमतों का असर अंततः यात्रियों की जेब पर भी पड़ सकता है। जब एयरलाइंस का परिचालन खर्च बढ़ता है तो कंपनियां टिकटों के किराये में संशोधन कर सकती हैं या फ्यूल सरचार्ज के माध्यम से अतिरिक्त लागत का कुछ हिस्सा यात्रियों से वसूल सकती हैं। इंडिगो प्रबंधन भी ईंधन की बढ़ती कीमतों का कुछ भार किराये में शामिल कर रहा है। हालांकि, कंपनी के सामने यह चुनौती है कि किराये में बढ़ोतरी और यात्रियों की मांग के बीच संतुलन बनाए रखा जाए। वॉल्श ने माना कि यात्री कम किराया चाहते हैं, लेकिन कंपनी को अपनी वित्तीय स्थिति को भी ध्यान में रखना होगा। ऐसे में आने वाले समय में हवाई टिकटों की कीमतें किस स्तर पर रहेंगी, यह काफी हद तक अंतरराष्ट्रीय ईंधन बाजार, रुपये की स्थिति और एयरलाइंस की लागत प्रबंधन रणनीति पर निर्भर करेगा। फिलहाल इंडिगो ने ईंधन की हेजिंग को लेकर कोई तत्काल बदलाव नहीं किया है। कंपनी की व्यापक समीक्षा पूरी होने के बाद ही भविष्य की रणनीति स्पष्ट होगी। ऐसे में हवाई यात्रियों के लिए आने वाले महीने महत्वपूर्ण हो सकते हैं, क्योंकि विमानन ईंधन की कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर हवाई यात्रा के बजट पर पड़ सकता है।















