नयी दिल्ली:. सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत शर्मा को बॉम्बे हाईकोर्ट के जज माधव जामदार से संवैधानिक प्रतिबद्धता सीखनी चाहिए. जस्टिस जामदार की सुरक्षा भी बढ़ानी चाहिए. क्योंकि सरकार से जुड़े गुंडे उनका भी हश्र जस्टिस लोया जैसा कर सकते हैं. ये बातें कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव शाहनवाज़ आलम ने साप्ताहिक स्पीक अप कार्यक्रम की 254 वीं कड़ी में कहीं. शाहनवाज़ आलम ने कहा कि बॉम्बे हाईकोर्ट जज जस्टिस माधव जामदार द्वारा एक विपक्षी दल के नेता को सरकार के ख़िलाफ़ नारेबाज़ी के आरोप में तड़ीपार करने की कार्यवायी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार और लोकतांत्रिक मूल्यों के ख़िलाफ़ बताकर पुलिस पर जुर्माना लगाया जाना एक साहसी फ़ैसला है. जिससे सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत शर्मा को संवैधानिक प्रतिबद्धता की सीख लेनी चाहिए जो अपने हर फैसले में सरकार के आगे लोटते दिखते हैं. उन्होंने कहा कि जस्टिस जामदार की यह मौखिक टिप्पणी की सरकार नागरिकों को ग़ुलाम बनाना चाहती है और पुलिस प्रधानमंत्री-मुख्यमंत्री की नौकर नहीं है, उन जजों के लिए भी सीख है जो सरकार के दबाव में या रिटायरमेंट के बाद सरकारी लाभ के लालच में मौलिक अधिकारों के ख़िलाफ़ फ़ैसले देते हैं. उन्होंने जस्टिस जामदार की सुरक्षा बढ़ाने की मांग यह कहते हुए की है कि उन्हें सत्ताधारी दल से जुड़े गुंडे जस्टिस लोया की परिणति तक पहुंचा सकते हैं.
कांग्रेस नेता ने कहा कि पश्चिम बंगाल में चुनाव जीतने के बाद से ही विपक्षी दलों के नेताओं पर पुलिस की मौजूदगी में भाजपा कार्यकर्ता लगातार हमले कर रहे हैं. यहाँ तक कि सार्वजनिक तौर पर घेर कर उनपर अंडे फेंके जा रहे हैं. लेकिन कोलकाता हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट इसका स्वतः संज्ञान तक नहीं ले रहा है. जो साबित करता है कि न्यायपालिका का एक बड़ा हिस्सा भाजपा और आरएसएस के दबाव में काम कर रहा है. शाहनवाज़ आलम ने कहा कि यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत में ऐसी घटनाएँ भले पहली बार हो रही हैं लेकिन आरएसएस जिस नाज़ी पार्टी की विचारधारा पर बनी है उसके शासनकाल में जर्मनी में भी ऐसे ही विपक्षी दलों और यहूदियों पर अंडे फेकने का अभियान चलाया जाता था. जिसकी अंतिम परिणति लाखों की संख्या में यहूदियों की हत्या के रूप में हुई थी. शाहनवाज़ आलम ने आरोप लगाया कि न्यायपालिका के एक हिस्से के सहयोग से आरएसएस देश पर तानाशाही थोप रहा है. इसीलिए आरएसएस के विरोध के साथ ही ऐसे जजों के ख़िलाफ़ भी अभियान चलाना चाहिए.











