रांची। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि जनजाति और हिंदू एक ही हैं। भले ही हमलोगों की पूजा की पद्धति अलग-अलग है। कोई पेड़ की पूजा करता है तो कोई पहाड़ की तो कोई देवी-देवता की, लेकिन भाव एक है। हिंदू कोई पूजा पद्धति नहीं है, बल्कि जीवन जीने की एक पद्धति है। एक रहेंगे तो शक्तिशाली रहेंगे। हजारों वर्षों से भारत की सभ्यता जंगल, खेती और प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर आगे बढ़ी है और वेदों एवं उपनिषदों का मूल भी इसी जीवन पद्धति से जुड़ा हुआ है। जहां तक मतांतरण कर ईसाई और मुसलमान बने जनजातियों की बात है तो उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए।
मोहन भागवत को सुनते लोग: उन्होंने सरना को पूजा पद्धति बताते हुए कहा कि इसे अलग धर्म के रूप में देखना समाज को तोड़ने का प्रयास है। आरएसएस का काम समाज को जोड़ने का है, विभाजित करने का नहीं है। डीलिस्टिंग का समर्थन करते हुए कहा कि यह लागू होना चाहिए। भले ही समय लग रहा है, लेकिन लागू जरूर होगा। सरकार इस पर जरूर ध्यान देगी।
भगवान बिरसा मुंडा से प्रेरणा लेने की है जरूरत
सरसंघचालक ने कहा कि भगवान बिरसा मुंडा से सभी लोगों को प्रेरणा लेने की जरूरत है। वह केवल जनजाति समाज के ही नहीं, बल्कि पूरे समाज के नायक हैं। उन्होंने धर्म और संस्कृति के लिए अपना प्राण न्योछावर कर दिया था। जहां तक जनजाति समाज में शिक्षा की बात है तो इस पर सभी को मिलकर विचार करना होगा। सरकार कोई भी हो सभी की अपनी सीमाएं हैं, इसलिए सामाजिक संगठनों को आगे आना होगा। जो भी संगठन इस क्षेत्र में काम कर रहे हैं, सभी को आपस में समन्वय से काम करना चाहिए। लव जिहाद, लैंड जिहाद और अवैध घुसपैठ पर मोहन भागवत ने कहा कि इसके लिए समाज को सजग होना होगा। स्थानीय हित रक्षक आदिवासी समाज को खड़ा होना होगा।













