चंडीगढ़। हरियाणा में विकास परियोजनाओं को गति देने और उनमें जमीन मालिकों की भागीदारी सुनिश्चित करने की दिशा में प्रदेश सरकार ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। मुख्यमंत्री नायबसिंह सैनी की अध्यक्षता में मंगलवार को हुई हरियाणा मंत्रिमंडल की बैठक में लैंड पूलिंग पॉलिसी-2026 को मंजूरी प्रदान कर दी गई। इस नीति के माध्यम से राज्य में विकास परियोजनाओं के लिए भूमि की उपलब्धता सुनिश्चित करने के साथ-साथ भू-मालिकों को भी विकास प्रक्रिया में भागीदार बनाने का प्रयास किया जाएगा। सरकार की इस पहल को शहरी विकास, आधारभूत ढांचे के विस्तार और नियोजित विकास की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हरियाणा में तेजी से बढ़ते शहरीकरण और औद्योगिक गतिविधियों के कारण विभिन्न क्षेत्रों में नई विकास परियोजनाओं की जरूरत महसूस की जा रही है। इसके लिए जमीन की उपलब्धता एक महत्वपूर्ण विषय रही है। सड़क, आवासीय क्षेत्र, औद्योगिक क्षेत्र और अन्य बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी योजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए भूमि की आवश्यकता होती है। ऐसे में लैंड पूलिंग पॉलिसी को मंजूरी मिलने से सरकार को विकास परियोजनाओं के लिए भूमि जुटाने की एक नई व्यवस्था उपलब्ध होगी। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की अध्यक्षता में हुई मंत्रिमंडल की बैठक में इस नीति को मंजूरी दिए जाने के बाद राज्य में इसके क्रियान्वयन को लेकर आगे की प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी। सरकार का उद्देश्य विकास परियोजनाओं में जमीन मालिकों को केवल भूमि उपलब्ध कराने वाले पक्ष के रूप में नहीं, बल्कि विकास प्रक्रिया के सहभागी के रूप में शामिल करना है।
क्या है लैंड पूलिंग पॉलिसी?
लैंड पूलिंग एक ऐसी व्यवस्था है, जिसमें अलग-अलग भू-मालिक अपनी जमीन को विकास के लिए एक साझा भूमि क्षेत्र के रूप में उपलब्ध कराते हैं। इसके बाद संबंधित प्राधिकरण या विकास एजेंसी उस भूमि पर नियोजित विकास कार्य कराती है। विकास प्रक्रिया पूरी होने के बाद नीति में निर्धारित शर्तों के अनुसार भू-मालिकों को विकसित भूमि या अन्य तय लाभ दिए जा सकते हैं।इस व्यवस्था का उद्देश्य जमीन के छोटे-छोटे टुकड़ों को एक साथ जोड़कर बड़े स्तर पर विकास परियोजनाओं को लागू करना होता है। इससे सड़क, सीवरेज, पेयजल, बिजली, पार्क, सामुदायिक सुविधाओं और अन्य बुनियादी ढांचे की योजनाओं को व्यवस्थित तरीके से विकसित करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, हरियाणा की लैंड पूलिंग पॉलिसी-2026 में भू-मालिकों को मिलने वाले वास्तविक लाभ, जमीन के बदले विकसित क्षेत्र का अनुपात, भागीदारी की शर्तें और आवेदन की प्रक्रिया जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं का निर्धारण नीति के विस्तृत प्रावधानों के अनुसार होगा।
विकास परियोजनाओं को मिलेगी नई गति
हरियाणा में पिछले कुछ वर्षों के दौरान शहरी क्षेत्रों का विस्तार हुआ है। गुरुग्राम, फरीदाबाद, पंचकूला और अन्य तेजी से विकसित हो रहे क्षेत्रों में आवासीय तथा व्यावसायिक गतिविधियों का विस्तार देखने को मिला है। इसके साथ ही नई सड़कों, औद्योगिक क्षेत्रों और सार्वजनिक सुविधाओं की मांग भी बढ़ी है। विकास परियोजनाओं को लागू करने के लिए पर्याप्त और उपयुक्त भूमि की उपलब्धता जरूरी होती है। कई बार अलग-अलग भूखंडों के स्वामित्व और भूमि अधिग्रहण से जुड़ी प्रक्रियाओं के कारण परियोजनाओं को आगे बढ़ाने में समय लग सकता है। लैंड पूलिंग जैसी व्यवस्था के माध्यम से भूमि मालिकों की भागीदारी लेकर विकास की प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित बनाने का प्रयास किया जा सकता है। इस नीति के जरिए सरकार का लक्ष्य विकास योजनाओं के लिए भूमि की उपलब्धता को आसान बनाना और संबंधित क्षेत्रों में आधारभूत सुविधाओं का विस्तार करना है। इससे नियोजित शहरी विकास को भी प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद है।
भू-मालिकों की भागीदारी पर रहेगा जोर
लैंड पूलिंग पॉलिसी की एक प्रमुख विशेषता जमीन मालिकों की भागीदारी है। परंपरागत भूमि अधिग्रहण व्यवस्था में सरकार निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत भूमि अधिग्रहित करती है और भू-मालिकों को मुआवजा दिया जाता है। इसके विपरीत लैंड पूलिंग व्यवस्था में जमीन मालिकों को विकास प्रक्रिया से जोड़ने की अवधारणा अपनाई जाती है। इसमें भूमि मालिकों की सहमति, पात्रता और निर्धारित शर्तों के आधार पर उनकी जमीन को विकास योजना में शामिल किया जा सकता है। विकास के बाद उन्हें नीति के अनुसार लाभ देने की व्यवस्था हो सकती है। इस तरह की व्यवस्था से जमीन मालिकों को भविष्य में विकसित क्षेत्र का हिस्सा मिलने की संभावना रहती है। हालांकि, इसके लिए यह जरूरी है कि नीति में सभी शर्तें स्पष्ट हों और भू-मालिकों को उनके अधिकारों तथा जिम्मेदारियों की पूरी जानकारी उपलब्ध कराई जाए।
पारदर्शिता और स्पष्ट नियम होंगे अहम
लैंड पूलिंग पॉलिसी के सफल क्रियान्वयन के लिए पारदर्शिता बेहद महत्वपूर्ण होगी। जमीन मालिकों को यह स्पष्ट होना चाहिए कि उनकी भूमि किस परियोजना में शामिल की जा रही है, विकास कार्यों की जिम्मेदारी किस एजेंसी की होगी और परियोजना पूरी होने के बाद उन्हें किस प्रकार का लाभ मिलेगा। इसके अलावा भूमि की पहचान, स्वामित्व संबंधी दस्तावेज, आपत्तियों के निस्तारण और विकास कार्यों की समयसीमा जैसे विषय भी महत्वपूर्ण होंगे। यदि इन सभी प्रक्रियाओं को स्पष्ट नियमों के तहत लागू किया जाता है, तो भू-मालिकों का भरोसा बढ़ाने में मदद मिल सकती है। सरकार के सामने यह भी चुनौती होगी कि विकास परियोजनाओं के दौरान किसानों और अन्य जमीन मालिकों के हितों का ध्यान रखा जाए। भूमि से जुड़े विवादों और प्रक्रियागत समस्याओं का समय पर समाधान करना भी नीति के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए जरूरी होगा।
हरियाणा में नियोजित विकास की दिशा में कदम
हरियाणा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र से जुड़ा महत्वपूर्ण राज्य है। दिल्ली के आसपास स्थित होने के कारण यहां आवासीय, औद्योगिक और व्यावसायिक गतिविधियों का लगातार विस्तार हो रहा है। ऐसे में भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए जमीन और बुनियादी सुविधाओं का बेहतर नियोजन करना सरकार के लिए अहम है। लैंड पूलिंग पॉलिसी-2026 को मंजूरी देकर राज्य सरकार ने इसी दिशा में एक नई पहल की है। इसके माध्यम से विकास परियोजनाओं के लिए भूमि जुटाने और भू-मालिकों को भागीदार बनाने की व्यवस्था को आगे बढ़ाया जा सकता है। मंत्रिमंडल की मंजूरी के बाद अब नीति के विस्तृत प्रावधानों, क्रियान्वयन की प्रक्रिया और संबंधित विभागों की भूमिका पर नजर रहेगी। जमीन मालिकों के लिए आवेदन, सहमति, पात्रता और लाभ से जुड़ी शर्तें इस नीति के वास्तविक प्रभाव को निर्धारित करेंगी। कुल मिलाकर, हरियाणा सरकार की लैंड पूलिंग पॉलिसी-2026 को मंजूरी राज्य में विकास परियोजनाओं को आगे बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक फैसला है। अब यह देखना होगा कि सरकार इस नीति को किस तरह जमीन पर लागू करती है और इससे भू-मालिकों तथा विकास परियोजनाओं को कितना लाभ मिलता है।















