माहिर रज़ा
जहानाबाद : इस्लामी कैलेंडर के अनुसार वर्ष के प्रथम माह मोहर्रम का चांद निकलते ही उन बेगुनाह शहीदों एवं मासूम बच्चों की याद आ जाती है जिन्हें अरब देश के क्रूर एवं अहंकारी तथा आतंकवाद के जन्म दाता शासक यजीद द्वारा कर्बला नामक स्थान पर घेर कर कई रोज़ का भूखा प्यासा रखकर बड़ी बेदर्दी से शहीद किया गया था कर्बला की त्रासदी मानव इतिहास की एक अद्वितीय घटना है जहां यज़ीद नामक अरब देश का शासक अपनी क्रूरता के कारण भय और नफ़रत फैलाकर लोगों पर राज करता था दूसरी ओर मोहम्मद साहब के नाती हज़रत हुसैन अमन पसन्द, इंसानियत एवं आपसी भाईचारे के पक्षधर थे यजीद द्वारा इमाम हुसैन के सामने पेशकश रखी गई कि या तो मेरे द्वारा किए जा रहे कार्यों का समर्थन करो अन्यथा अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहो इमाम हुसैन ने यज़ीद की इस पेशकश को यह कहकर ठुकरा दिया कि मुझ जैसा तुझ जैसे व्यक्ति का समर्थन नहीं कर सकता मैं केवल अच्छे मूल्यों का प्रसार करना और बुराई को रोकना चाहता हूं परिणाम स्वरूप यजीद के आदेशानुसार उसके लोगों द्वारा इमाम हुसैन और उनके परिवार पर अकथनीय अत्याचार किए जाने लगे तथा कर्बला नामक स्थान पर नहरे फ़ुरात के क़रीब हज़रत हुसैन के 71 साथियों सहित 72 बेगुनाहों को जिसमें हजरत हुसैन के 6 माह का बच्चा अली असगर एवं 4 वर्षीय पुत्री तथा 85 वर्षीय बचपन के दोस्त हबीब को चिलचिलाती धूप और तपती रेत पर कई रोज का भूखा प्यासा रखकर 10 अक्टूबर 680 ई0 को बड़ी बेदर्दी से शहीद कर दिया गया था जिनकी याद प्रत्येक वर्ष मोहर्रम का चांद देखते ही ग़म के माहौल में मनाई जाती है उपरोक्त जानकारी देते हुए ताज़ियेदार सैय्यद ज़ैग़म अब्बास ने बताया कि इमाम हुसैन की शहादत के बाद महिलाओं , तथा बच्चियों को रेगिस्तानी रेत पर नंगे पैर कर्बला से कूफ़ा तथा कूफ़े से दमिश्क तक बंधक बनाकर चलाया गया एवं महिलाओं तथा बच्चों पर जघन्य अत्याचार कर क़ैद खाने में डाल दिया गया कर्बला अन्याय के खिलाफ संघर्ष का प्रतीक है कर्बला के शहीदों ने यह साबित कर दिया कि संख्या चाहे कितनी भी कम क्यों ना हो अंततः सत्य और न्याय की जीत होती है हज़रत इमाम हुसैन चौदह सौ वर्ष पूर्व शहीद हुए थे लेकिन उनकी अविनाशी आत्मा आज भी लोगों के दिलों पर राज करती है















