- परिजनों और रिश्तेदारों ने फूल माला पहनाकर विदा किया
कानपुर देहात के राजपुर कस्बे के पटेल नगर निवासी मोहम्मद सादिक मास्टर और उनकी पत्नी आमना खातून हज यात्रा के लिए मक्का मदीना रवाना हो रहे हैं। मंगलवार को उनके घर पर एक विदाई कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस अवसर पर राजपुर, खासबरा सहित आसपास और दूर-दराज के रिश्तेदारों ने पहुंचकर उनका इस्तकबाल किया। लोगों ने उन्हें फूल मालाएं पहनाईं, मुंह मीठा कराया और मुसाफा कर हज के दौरान दुआ व सलाम कहने का आग्रह किया। इस दौरान कारी जावेद ने हज की मुख्य रस्मों के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि हज के दौरान मुसलमान इहराम (सफेद पोशाक) पहनकर मक्का में काबा की परिक्रमा करते हैं, सफा-मरवा पहाड़ियों के बीच दौड़ते हैं, अराफात के मैदान में इबादत करते हैं, मुजदलिफा में रात बिताते हैं और मीना में शैतान को पत्थर मारते हैं।
हज की मुख्य रस्मों में सबसे पहले इहराम धारण करना शामिल है, जिसमें बिना सिलाई के दो सफेद कपड़े पहनकर सादगी और समानता का प्रतीक दर्शाया जाता है। इसके बाद मक्का पहुंचकर काबा की सात बार घड़ी की विपरीत दिशा में परिक्रमा (तवाफ-ए-कुदूम) की जाती है। फिर सफा और मरवा पहाड़ियों के बीच सात बार दौड़ना (सई) होता है, जो बीबी हाजरा की याद में किया जाता है। 8 ज़ुल-हिज्जा को हाजी मीना शहर में रात गुजारते हैं। 9 ज़ुल-हिज्जा हज का सबसे महत्वपूर्ण दिन होता है, जब हाजी अराफात के मैदान में नमाज और दुआओं में समय बिताते हैं, जहां पैगंबर मोहम्मद ने अपना आखिरी उपदेश दिया था। अराफात के बाद, हाजी मुजदलिफा में रात गुजारते हैं और पत्थर (कंकड़) जमा करते हैं। 10 ज़ुल-हिज्जा को जमारात में शैतान को पत्थर मारते हैं (रमी), जो बुराई के खिलाफ संघर्ष का प्रतीक है। इसके बाद बकरे या भेड़ की कुर्बानी दी जाती है और पुरुष अपने सिर के बाल मुंडवाते हैं (हलाल)। हज का समापन काबा के अंतिम तवाफ (तवाफ-ए-जियारत) के साथ होता है, जिसके बाद मक्का से रवानगी होती है।














